बुधवार, 9 दिसंबर 2009

आशियाँ


कुछ पत्थर हिन्दुओं ने चलाया

कुछ मुसलमानों ने

बेहतर होता

उससे

किसी

गरीब के लिए

एक आशियाँ बनाते।

सोमवार, 23 नवंबर 2009

२६/११






एक गोली



सन्न से आकर



सीने में धंसी होगी,



जब गिन रहा था



वो आख़िरी साँसें



उसके सामने



उसकी बीवी की उजड़ी मांग



बच्चों का चेहरा



और बूढी माँ भी रोती रही होगी ...




शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

बेदर्द दर्द?


दर्द को भी अब दर्द होने लगा


दर्द ख़ुद ही मेरे घाव धोने लगा


दर्द के मारे हम तो बहुत रोये


अब दर्द ख़ुद मुझे छूकर रोने लगा।

शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

शराफत


शराफत

इंसानों की कैसी ये शराफत है

झूठ की नींव पे खड़ी सच की इमारत है

जेब में है खून से सने खंजर

औ' जुबां पे इबादत है ............




शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

`गे' हो


`गे' हो


अदालती आदेश के बाद देश की तस्वीर कुछ ऐसी हो सकती है ...


१) शाइनी आहूजा पर पुरूष नौकर से बलात्कार का आरोप।


२) सभी लड़कियां बिंदास्त होंगी और लड़कियां लड़कों को छेड़ेंगी।


३) 'पक्के` दोस्तों को दुनिया टेढी नज़र से देखेगी।


४) शादी के बाद दोनों पक्षों के लोग कहेंगे 'हमें लड़का पसंद है'


५) ट्रेन, बस, संसद में गे आरक्षण की मांग उठेगी।


६) १ जुलाई गे दिवस के रूप में मनाया जाएगा।


७) अगला आस्कर 'गे हो' के लिए मिलेगा। जिसे कोई राजनीतिक पार्टी अपना घोष वाक्य बनाएगी।


८) पृथक गे राज्य बनाने की और गे हाऊसिंग सोसाइटी बनाने की मांग की जायेगी।


९) गे एजूकेशन शुरू होगा।


१०) गाय, गीता और गंगा के देश में गे, नीचता और नंगा का बोलबाला होगा।


गे हो.......


मंगलवार, 5 मई 2009

सोमवार, 20 अप्रैल 2009

मौत

कल मै दादर स्टेशन -मुंबई पर उतरा । वहां से मुझे धीमी लोकल पकडनी थी। तभी मैंने कुछ लोगों के चिल्लाने की आवाज़ सुनीमैंने देखा कि एक नवयुवक जो कि ट्रेन की छत पर बैठा था, उसने ओवर हेड वायर छू लिया जिससे उसने प्राण त्याग दिए। मैंने देखा कि पहले वह तड़पा फ़िर उसके शरीर का रंग पहले मरूं और फ़िर कला पड़ने लगा। लोगों के चिल्लाने पर घोषणा हुई और कुछ कुलियों और कुछ अन्य लोगों कि सहायता से उसके शरीर को ट्रेन की छत से नीचे उतारा गया। यह पोस्ट थोड़ी वीभत्स जरुर है लेकिन यह उन लोगों को संदेश भी है जो हीरो गीरी करने से बाज़ नही आते। कम से कम इस बारे में हम जागरूकता तो फैला ही सकते हैं कि छैया छैया करना फिल्मो में ही अच्छा लगता है। क्या इस तस्वीर को शाहरुख़ खान तक पहुँचाया जाए?

बुधवार, 1 अप्रैल 2009

धर्म


पुन: मुंबई के लोकल ट्रेन की एक कहानी बताता हूँ। उपनगर बोरीवली से ट्रेन खुली। एक मंडली आयी, बातें शुरू हुई। शीर्षक था `अध्यात्म'। `अहिंसा'। एक महाशय ने लगभग १० मिनट प्रवचन दिया। जीवन में धर्म कैसे उतरे। सभी उनकी हाँ में हाँ मिला रहे थे। ऐसा लगा मानो महाशय व्यासपीठ से प्रवचन दे रहे हों। तभी ऊपर रैक पर रखा किसी का एक बैग सीधे उनके सर पर आ गिरा। तथाकथित प्रवचनकार के भीतर का दुर्वासा जागृत हो गया। उन्होंने इतनी गालियाँ बंकी की पूछिये मत! जिसका बैग था आया और माफी मांग कर, बैग लेकर चला गया । इधर प्रवचनकार महाशय फ़िर से शुरू हो गए। ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय। औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय। ट्रेन अपनी रफ़्तार पकड़ चुकी थी।

शुक्रवार, 30 जनवरी 2009

मंगलवार, 13 जनवरी 2009

दो शब्द




मैं गया


वो आई


मिटी तनहाई।


वो जवां


मैं जवां


हम कहाँ?


वो हंसी


मैं हंसा


दिल फंसा।


वो बोली


मैं बोला


राज़ खोला।


मैं गरीब


वो अमीर


बोला ज़मीर।


वो रूठी


मैं रूठा


विश्वास टूटा।


वो दुखी


मैं दुखी


किस्मत रूठी।


वो वहाँ


मैं यहाँ


हम कहाँ?


वो दुल्हन


टूटे सपन


लौटे वतन।


वो जिंदा


हम दफ़न


कहानी ख़तम।