शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

शराफत


शराफत

इंसानों की कैसी ये शराफत है

झूठ की नींव पे खड़ी सच की इमारत है

जेब में है खून से सने खंजर

औ' जुबां पे इबादत है ............




2 टिप्‍पणियां:

M VERMA ने कहा…

इन चार पंक्तियो ने तो सारी दास्तान कह दी

Mithilesh dubey ने कहा…

अच्छी रचना
कृष्ण जन्माष्टमी की व स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ