सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

हिंदी की आत्मा अवधी





पिछले दिनों मुंबई में अवधी सम्मलेन आयोजित किया गया। अवधी भाषा में काव्यपाठ के लिए मेरे मित्र राजेश विक्रांत ने मुझे फोन किया। मै अपने आपको सम्मानित महसूस कर रहा था कि आज तक मंचों पर हिंदी में वो कवितायें सुनाई जो लोग सुनना चाहते थे, आज मै वो कविता सुनाऊंगा जिसमे मेरी भाषा की महक होगी।



मुंबई -विलेपार्ले के शुभम हाल में मै पंहुचा तो गिनेचुने कविऔर लगभग उतने ही सुनने वाले। पहले परिचर्चा शुरू हुई जिसमे कई विद्वानों ने अपने विचार रखे। फिर कवियों ने अपना रंग दिखाना शुरू किया। मै तब तक दर्शक दीर्घा में ही बैठा था। काफी देर हो चुकी थी। मै इंतज़ार कर रहा था कि संचालक देवमणि पाण्डेय जी मुझे कब बुलाते हैं। मैंने धीरे से पीछे मुड़कर देखा तो अवाक रह गया। तब तक पूरा हाल भर चुका था। मै गदगद हो गया कि आज भी अपनी भाषा के प्रति लोग कितना लगाव रखते हैं कि मुंबई जैसे शहर में व्यस्त होने के बावजूद लोग इतनी बड़ी संख्या में वहां पहुंचे ।



खैर मेरी बारी आयी। एक नामचीन अखबार में काम करने और कुछ टीवी धारावाहिकों में काम करने के कारण कुछ लोग मुझे जानने लगे है। कुछ ने मुझे पहचाना, कुछ के बारे में मैंने चाहा कि वे मुझे पहचानें । मंच पर पहुंचा । मैंने पहली कविता `सोन्ह सोन्ह माटि महिके चलइ रे बयरिया, गवुंवामें हमरे चलई पुरवैय्यागाये लोगों ने काफी तारीफ़ की। तालियों के बाद मेरा हौसला और बढ़ा। मैंने दूसरी कविता `आव चली गवुंवाकी ओर के अलावा कुछ और कवितायें सुनाईं । पहली बार प्रतीत हुआ कि मैंने अपनी भाषा के लिए कुछ किया। काव्य गंगा अवधी में बही जा रही थी , लोग भी साथ डुबकी लगाए जा रहे थे। आखिरी कवि के बाद लोग भोजन के लिए निकले। लोग भोजन के दौरान भी अपनी भाषा में बात कर रहे थे।



कार्यक्रम की कुछ झलकियाँ



लोक जीवन की अदभुत झाँकी प्रस्तुत करने वाली अवधी भाषा बड़ी भाग्यशालीहै। इसके सौभाग्य का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि इसे गोस्वामी तुलसीदाससरीखा महाकवि मिला और गोस्वामीजी का सौभाग्य कि उन्हें श्रीराम सरीखामहानायक मिल गया । परिणामस्वरूप श्रीरामचरितमानस जैसे महाकाव्य की रचनाहुई । ये विचार मुंबई विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ.रामजी तिवारी ने ‘रंग भारती’ और "हम लोग" द्वारा मुम्बई ( विलेपार्ले )के शुभम हाल में आयोजित "अवधी सम्मेलन" में व्यक्त किए ।



अवधी अकादमी के अध्यक्ष व बोली बानी के संपादक जगदीश पीयूष ने प्रमुखवक्ता के रूप में बोलते हुए कहा कि अवधी भाषा उ.प्र. के 24, बिहार के 2तथा नेपाल के 8 जिलों में लगभग 12 करोड़ लोगों की भाषा है । तुलसीदास,अमीर खुसरो, मलिक मोहम्मद जायसी, मुल्ला दाउद, कबीर, कुतुबन, मंझन औररहीम सरीखे महाकवियों ने अवधी में काव्य रचना करके इस लोकभाषा को गौरवप्रदान किया।



नवभारत टाइम्स के वरिष्ठ पत्रकार अनुराग त्रिपाठी ने कहा कि हिंदी कोजन्म देनेवाली अवधी का दीप मुंबई में पहली बार प्रज्जवलित हुआ है, हमेंइसे हमेशा जलाए रखना है।



दोपहर का सामना के कार्यकारी संपादक प्रेम शुक्लने अवधी हिंदी की आत्मा है । श्रीरामचरितमानस व पदमावत के बिना हिंदी कीकल्पना ही नहीं की जा सकती। उन्होंने अवधी प्रेमियों को भरोसा दिलाया कि"रंगभारती" की ओर से शीघ्र ही "अवध महोत्सव" का आयोजन किया जाएगा ताकिअवधी का प्रवाह रुकने नहीं पाए।
कवि-गीतकार देवमणि पांडेय ने बताया कि सुलतानपुर के लोककवि पं।रामनरेशत्रिपाठी ने 1925 और 1930 के बीच अवध क्षेत्र का दौरा करके 15 हज़ार सेभी अधिक लोकगीतों का संग्रह किया था । इसी के आधार पर उन्होंने ‘कविताकौमुदी’ किताब लिखी । उनके इस प्रयास की सराहना महात्मा गाँधी और पं.जवाहरलाल नेहरु ने भी की थी ।



इस अवसर पर आयोजित लोककाव्य संध्या में गीतकार हरिश्चंद्र, बृजनाथ, आनंदत्रिपाठी, पं. किरण मिश्र, देवमणि पांडेय, डॉ.बोधिसत्व, ह्रदयेश मयंक,रामप्यारे रघुवंशी, सुरेश मिश्र, ओमप्रकाश तिवारी, अभय मिश्र, रासबिहारीपांडेय, मनोज मुंतशिर, आदि ने लोकभाषा की बहुरंगी रचनाएं सुनाकर श्रोताओंको भावविभोर कर दिया । समारोह में मुम्बई की धरती पर सर्वप्रथम रामलीलाका आयोजन करने वाले स्व.शोभनाथ मिश्र के सुपुत्र तथा "श्री महाराष्ट्ररामलीला मंडल" के महामंत्री द्वारिकानाथ मिश्रा का सम्मान किया गया ।लोकगायक दिवाकर द्विवेदी व बाल कलाकार आदित्यांश ने भी सम्मेलन मेंभागीदारी की। अतिथियों का स्वागत "हम लोग" संस्था के अध्यक्ष एडवोकेटविजय सिंह ने किया । आभार प्रदर्शन अवधी सम्मेलन मुंबई के संयोजक राजेशविक्रांत ने माना।


2 टिप्‍पणियां:

Randhir Singh Suman ने कहा…

nice

बेनामी ने कहा…

Avadhi bhasha ke sammaan me aapke vichar jaankar badi prasannata huee. bhasha ke prati yah prem banaye rakhiye.
jay avadhi.
Anupam Mishra