पुन: मुंबई के लोकल ट्रेन की एक कहानी बताता हूँ। उपनगर बोरीवली से ट्रेन खुली। एक मंडली आयी, बातें शुरू हुई। शीर्षक था `अध्यात्म'। `अहिंसा'। एक महाशय ने लगभग १० मिनट प्रवचन दिया। जीवन में धर्म कैसे उतरे। सभी उनकी हाँ में हाँ मिला रहे थे। ऐसा लगा मानो महाशय व्यासपीठ से प्रवचन दे रहे हों। तभी ऊपर रैक पर रखा किसी का एक बैग सीधे उनके सर पर आ गिरा। तथाकथित प्रवचनकार के भीतर का दुर्वासा जागृत हो गया। उन्होंने इतनी गालियाँ बंकी की पूछिये मत! जिसका बैग था आया और माफी मांग कर, बैग लेकर चला गया । इधर प्रवचनकार महाशय फ़िर से शुरू हो गए। ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय। औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय। ट्रेन अपनी रफ़्तार पकड़ चुकी थी।
8 टिप्पणियां:
bahut khoob janab..
blog shuru hua aour shuruaat me dhansu katha...
बढिया पोस्ट लिखी है।
वाह !! ऐसे भी लोग होते हें।
जरूर कभी नेता रहा होगा!
ऐसे ही हैं आज के ज्ञानबाटक!!
सचमुच लोगों की कथनी और करनी में बहुत फर्क आ चुका है...........
Shaayad kisi ne theek hi kaha hai par updesh kushal bahutere...
Shaayad kisi ne theek hi kaha hai par updesh kushal bahutere...
एक टिप्पणी भेजें