शुक्रवार, 28 नवंबर 2008

ये कैसा मातम है ?

मुंबई ने कई आतंकी हमले झेले है लेकिन मुम्बईकरों का जूनून कभी ख़त्म नही होता। हर हमाले के बाद मुंबई और मजबूत होकर उभरती है। जब इस घटना से द्रवित हुआ तो एक कविता बन पडी पेश कर रहा हूँ ...
ये कैसा मातम है...
खामोश हुई जुबां, दिल उदास
बीमार हौसले, उम्मीदें कमजोर
और आँखे हुई नम हैं
मेरे जिस्म में मचा कैसा मातम है
कल तक दिल हंसता था
अब हँसते लबों में दर्द झलकता है
चमकते सूरज के पीछे भी तम है
मेरे जिस्म में मचा कैसा मातम है
जज्बा बूढा हो चला है सरकार सा
दिल्ली की शिखंडी हरकतों से
परेशां तुम हो, और हम हैं
मेरे जिस्म में मचा कैसा मातम है
जिंदगी हमें जिसने दी है
वही जान ले ले, गम नही
पर फिदायीनी गोली से निकला दम है
मेरे जिस्म में मचा कैसा मातम है
आज टूटे है, कल फ़िर जुडेंगे `अभय'
काफिरों से हम डरते नही
खैरखाह है कई, फ़िर भी कम है
मेरे जिस्म में मचा कैसा मातम है
बीमार हौसले, उम्मीदें कमजोर
और आँखे हुई नम हैं
मेरे जिस्म में मचा कैसा मातम है

2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

Bahut hi marmik kavita hai. Ismme mumbai dhamako ke bad ka dard jhlakta hai.

Pankaj Gandhi Jaiswal ने कहा…

Dard to hamko bhi bahut ho raha hai, kyo na ham log bhi mass ko brave banane ke liye koi abhiyaan chalaya jaye