रविवार, 18 जुलाई 2010

माँ


माँ, मैं तेरे चेहरे की झुर्रियों को पढ़ने लगा हूँ,
माँ, मैं तेरे चेहरे की झुर्रियों को समझने भी लगा हूँ,

मैं सीख गया हूँ कि
दिल में दर्द हो तो
मुस्कुराया कैसे जाता है,
माँ, तू ऐसी क्यों है?

मैं जान गया हूँ कि
खुद व्रत उपवास रखकर
बच्चों का पेट कैसे भरा जाता है,
माँ, तू ऐसी क्यों है?

दुनिया में जब आया
सबसे पहले तेरा ही नाम गाया
जब-जब मैंने चोट खाई
तेरी आँख क्यों भर आयी?
माँ, तू ऐसी क्यों है?

जब घर के लोग मुझसे पूछते हैं
कितना कमाया, कितना बचाया
तब तू पूछती है,
बेटा, तूने खाना खाया?
माँ, तू ऐसी क्यों है?