सोमवार, 20 अप्रैल 2009

मौत

कल मै दादर स्टेशन -मुंबई पर उतरा । वहां से मुझे धीमी लोकल पकडनी थी। तभी मैंने कुछ लोगों के चिल्लाने की आवाज़ सुनीमैंने देखा कि एक नवयुवक जो कि ट्रेन की छत पर बैठा था, उसने ओवर हेड वायर छू लिया जिससे उसने प्राण त्याग दिए। मैंने देखा कि पहले वह तड़पा फ़िर उसके शरीर का रंग पहले मरूं और फ़िर कला पड़ने लगा। लोगों के चिल्लाने पर घोषणा हुई और कुछ कुलियों और कुछ अन्य लोगों कि सहायता से उसके शरीर को ट्रेन की छत से नीचे उतारा गया। यह पोस्ट थोड़ी वीभत्स जरुर है लेकिन यह उन लोगों को संदेश भी है जो हीरो गीरी करने से बाज़ नही आते। कम से कम इस बारे में हम जागरूकता तो फैला ही सकते हैं कि छैया छैया करना फिल्मो में ही अच्छा लगता है। क्या इस तस्वीर को शाहरुख़ खान तक पहुँचाया जाए?

बुधवार, 1 अप्रैल 2009

धर्म


पुन: मुंबई के लोकल ट्रेन की एक कहानी बताता हूँ। उपनगर बोरीवली से ट्रेन खुली। एक मंडली आयी, बातें शुरू हुई। शीर्षक था `अध्यात्म'। `अहिंसा'। एक महाशय ने लगभग १० मिनट प्रवचन दिया। जीवन में धर्म कैसे उतरे। सभी उनकी हाँ में हाँ मिला रहे थे। ऐसा लगा मानो महाशय व्यासपीठ से प्रवचन दे रहे हों। तभी ऊपर रैक पर रखा किसी का एक बैग सीधे उनके सर पर आ गिरा। तथाकथित प्रवचनकार के भीतर का दुर्वासा जागृत हो गया। उन्होंने इतनी गालियाँ बंकी की पूछिये मत! जिसका बैग था आया और माफी मांग कर, बैग लेकर चला गया । इधर प्रवचनकार महाशय फ़िर से शुरू हो गए। ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय। औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय। ट्रेन अपनी रफ़्तार पकड़ चुकी थी।