
मुंबई के उपनगर बोरीवली से लोकल ट्रेन खुली। धीरे-धीरे ट्रेन पूरी रफ्तार पकड़ चुकी थी। दो स्टेशन बाद भीड़ काफी बढ़ चुकी थी। सुबह पीक आवर होने के कारण गोरेगांव स्टेशन तक धक्कामुक्की बढ़ने लगी थी। ट्रेन में बातचीत का दौर शुरू हुआ। टाइम पास के लिए बातें शुरू हो गयी। देश के लिए मर -मिटने वाले कमांडो की तारीफों के पुल बांधे जा रहे थे। पाकिस्तान को दस गालियाँ एक साथ मिल रही थी।
तभी उस भीड़ भरे डिब्बे में ८-१० हिंदुस्थानी सेना के जवान चढ़े। वर्दी में। पसीने में तर-बतर। उनके पास बहुत सारा सामान भी था। स्वाभाविक था डिब्बा फर्स्ट क्लास का था तो लोगों की भौहें तन गयी थी। फर्स्टक्लास के लोगों के कपड़ो की सलवटे जो ख़राब हो रही थीं। २-५ मिनट कोई कुछ नही बोला। फ़िर कुछ ने बोलना शुरू कर दिया। `ये फर्स्टक्लास का डिब्बा है ।' फ़िर सभी ने बोलना शुरू कर दिया। `नीचे उतरो -दूसरा डिब्बा पकडो।' `ये टाइम क्यों आए'। जैसी बातों से सेना के जवान `घायल' होने लगे थे। खैर , सांताक्रुज स्टेशन आते ही सारे जवान उतर गए। लेकिन जाते-जाते जवानों में से एक जवान बोला। धन्यवाद सब लोगों को आपने हम लोगों को १५ मिनट `सहा'। हम सीमा पर आपके लिए ही इससे भी कही ज्यादा `सहते' हैं। कोई बात नही। जय हिंद।।।
ट्रेन में सभी `फर्स्ट क्लास' वालो को अपनी वैचारिकी के `क्लास' का पता चल चुका था।







